शुभ चिंतकों के नाम पत्र
सच के होने का बोध कौन जान सकता है? वही जो सच का बोझ उठाये. सच के सवालों से घिर जाने पर, सारा रास्ता बंद हो जाता है. हिम्मत जुटा कर, और छाती फुलाकर सच का सामना करना होता है, अपना रास्ता खोलना होता है. इसके इलावा और कोई उपाय क्या है! ख़बरों में बने हुए हैं, लोग नज़रें गड़ा कर देख रहें हैं. दोस्तों को भी चैन तो नहीं ही है, मेसेज भेज कर पूछ रहे हैं, "कैसे हो, सब ख़ैरियत है, क्या चल रहा है". हमारे शुभचिंतक हों या न हों चिंता सभी को है. लेकिन समस्या तो हमारी है, हल हमें ही ढूँढना है, सच का इम्तिहान भी कितनी बार देना होगा!

