शुभ चिंतकों के नाम पत्र

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सच के होने का बोध कौन जान सकता है? वही जो सच का बोझ उठाये. सच के सवालों से घिर जाने पर, सारा रास्ता बंद हो जाता है. हिम्मत जुटा कर, और छाती फुलाकर सच का सामना करना होता है, अपना रास्ता खोलना होता है. इसके इलावा और कोई उपाय क्या है! ख़बरों में बने हुए हैं, लोग नज़रें गड़ा कर देख रहें हैं. दोस्तों को भी चैन तो नहीं ही है, मेसेज भेज कर पूछ रहे हैं, "कैसे हो, सब ख़ैरियत है, क्या चल रहा है". हमारे शुभचिंतक हों या न हों चिंता सभी को है. लेकिन समस्या तो हमारी है, हल हमें ही ढूँढना है, सच का इम्तिहान भी कितनी बार देना होगा!

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डिजिटल युग का प्यार

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ये कौन सा गुलाब है जिसमें कोई खुशबू नहीं! कहीं से आया, फिर कहीं और भेज दिया, मतलब फॉरवर्ड कर दिया. गुलाब प्यार का प्रतीक बनकर बार-बार एक जगह से दूसरी जगह टहल रहा है. इस डिजिटल युग में टहलने का कोई खर्चा भी नहीं है. गुलाब को टहलने में, मज़ा आ रहा होगा या दुःख, ये तो पता नहीं.

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चैटजीपीटी  (ChatGPT) 

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कवी मन की बात को व्याकुल होकर अपनी क़लम की रोशनाई के सहारे कागज़ पर उतारता है। कागज़ को बार बार पढता है, ख़ुद से पूछता है। दिल की पीड़ा कागज़ पर आइना बनकर उतरी या नहीं।इस क्रम में शब्दों को काटता छांटता और जोड़ता है। जैसे दर्ज़ी, एक सुंदरी के लिए पोशाक तैयार कर रहा हो।बस उसकी कविता विश्व सुंदरी बन जाए, महफ़िल में खुब वाह वाही लुटे। उसके दिल की बात लोगों के दिलों को छू ले। लेकिन कविता सुनाने के क्रम में दूसरों की कविता पहले सुन्नी पड़ती है। वो अपनी सुना कर भाग खड़े होते हैं, अरे नंबर जो देर से आया।मन की पीड़ा कागज़ पर उतार तो लिया, लेकिन मन में नई पीड़ा उभरने लगी।भाई थोड़ा तो रुक जाते, हमारी भी सुन लेते, यूँ छोड़ के ना जाओ.

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