गुब्बारे की उड़ान देख धन्नो का ध्यान अटक गया. रंग-बिरंगा गोला, कुछ आवाज़ें, और हवा से कर रहा था बातें. उसी दिशा में हम भी भागने लगे, जिधर गुब्बारा जा रहा था. उड़ने के लिए ऊर्जा चाहिए, गुब्बारे में आग जल रही थी. सवार लोग उत्साहित होकर तरह-तरह की आवाज़ें निकाल रहे थे. जैसे धन्नो को सब कुछ पता हो…. गुब्बारा नीचे उतरने वाला था, और हम भी वहां पहुंचने के लिए रास्ता ढूंढने लगे. सड़क के बीचों-बीच गुब्बारा उतरने लगा तो दोनों ओर से गाड़ियां रुक गयीं. धीरे-धीरे गुब्बारा सिकुड़ने लगा, फिर धराशाई हो गया. पूरा क्रू उसे समेटने में लगा था, लोग खड़े होकर नज़ारा देख रहे थे. काफ़ी ख़ुशी का माहौल था, बच्चे तालियां बजा रहे थे, मानो उनकी ईद हो गई.



धन्नो बोली -“तुम इतनी ललचाई नज़रों से मत देखो,हम ज़मीन पर ही खुश हैं. हमारे प्यार की उड़ान मज़बूत है, बैलून जैसी नहीं जो गैस के दम पर आग लगा कर उड़ी, और आग बुझते ही धराशाई हो गई. हमारे प्यार की आग कई जन्मों तक जलती रहेगी.” चचा ग़ालिब का शेर याद आ गया:
ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता
दाग़ देहलवी
ख़लीक़

