धन्नो आज 15 मील भाग कर थक सी गई, फ़व्वारे के पास आकर रुक गई. पानी के छींटे उड़ कर धन्नो को छू रहे थे. धन्नो को भी जैसे भीगने का मौक़ा मिल गया हो. मैंने कहा – “धन्नो तू बस फ़व्वारे को देख कर रुकी थी! मुझे तो लगता है तू भी अब धार्मिक प्रवृत्ति की होती जा रही है”.
“कभी-कभी तुम भी ना! बेतुकी बातें करते हो; तुम्हें पता है ना, मैं नास्तिक हूँ”.
“अच्छा सामने देखो, चर्च नज़र आ रहा है. किसी ने देख लिया तो बात बनाएंगे. शहर में बात फैलेगी; अफ़वाह ही सही – ‘धन्नो ने ईसाई धर्म अपना लिया है’. अगर थोड़ी देर के लिए, इसे सच मान लें, तो तेरा नाम भी बदलना पड़ेगा. अच्छा, धन्नो से बदलकर डायना रख देंगे. तुझे पता है, इंग्लैंड की राजकुमारी का नाम डायना था.”
धन्नो हंस कर बोली “फिर तो तुम इंग्लैंड के राजकुमार बन गए. पहले, अपनी चमड़ी देख लो”




“धन्नो तू तो बुरा मान गई, अच्छा तुझे पता है, इंग्लैंड के प्रधान मंत्री भारतीय मूल के हैं”
धन्नो बोली, “हाँ, लेकिन कुर्सी उनको उनकी क़ाबलियत की वजह से मिली है, और तुम अफ़वाह फैलाकर, उसका फ़ायदा उठाकर, ख्यालों में ही राजकुमार बनने का सपना देखने लगे!”
“मैं तो मस्जिद भी गई थी, तब तो तुमने मेरा नाम बदलकर धन्नो से दीबा रखने की बात नहीं कही!”
मैंने कहा “अच्छा धन्नो, चल अब ग़ुस्सा थूक दे, यहां गंगाजल तो मिलना मुश्किल है, मिसिसिपी नदी में ही स्नान कर मंदिर हो आना”
“अरे तुम भूल जाते हो, मैं तो एक आत्मा हूँ. आत्माओं को शुद्धि और स्नान की जरूरत नहीं होती. नास्तिक हूँ, लेकिन सर्वधर्म समभाव में हमारा विश्वास है.”
“ज़रा देर चर्च या मस्जिद के पास दिख क्या गयी, की तुम तो अनापशनाप बातें फैलाने लगे! अपने अंदर झांको, आत्मा से पूछो, शायद गंगा स्नान की तुम्हें ज़्यादा ज़रूरत है”
मैंने आगे धन्नो की बातों का कोई जवाब नहीं दिया. मेरी ख़ामोशी में ही बाक़ी जवाब छिपे थे.
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
निदा फ़ाज़ली
ख़लीक़


बहुत बहुत बहुत👌👌
हीं सुन्दर अभिव्यक्ति है