पुल

पुल अपना नया रूप लेकर फिर खड़ा हो गया। दो किनारों को जोड़ने की सेवा में लगा है। लेकिन भागती हुई गाड़ियों को क्या पता, उन्हें तो बस अपनी रफ़्तार से मुहब्बत है! रफ़्तार में गिरफ़्तार होकर पुल को ही झकझोर देती हैं।

अभी कुछ सप्ताह पहले ही, पुल फिर से ट्रैफिक के लिए खोला गया। पुल बिलकुल नई-नवेली दुल्हन की तरह एक अलग रूप में नज़र आ रहा है। लेकिन सवारियों के लिए पुल, एक पुल से ज़्यादा और कुछ भी नहीं! अगर छायाकार न होता तो उसके यौवन को कौन निहारता! आधे खड़े – आधे गड़े, पानी के अंदर और पानी के बाहर; जैसे आधा शरीर मिसिसिपी में डुबकी लगा रहा हो। लेकिन पुल को डुबकी लगाने की क्या ज़रूरत, उसे कौन सा पाप धोना है!

लेकिन वो स्वार्थी नहीं, तेज़ रफ़्तार कारों में सवार लोगों की हिफाज़त के लिए डुबकी लगा कर दुआएं मांग रहा है, ताकि वो बुलेट की रफ़्तार में पुल को झकझोर कर ही सही, पर बा-हिफाज़त दूसरे किनारे को निकल जाएँ. भागती चमचमती कारें, अपना दबदबा बताकर, जाने किसको दबा रहीं हैं!

जहाँ-ए-फ़िक्र-ओ-अमल में ये मेरा ज़ोम-ए-वजूद
फ़क़त नुमाइश-ए-पोशाक के सिवा क्या है!
हिमायत अली शाएर

ख़लीक़

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