दिल्ली में, सुखदेव विहार के आस पास स्वास्थ्यकर्मी रहते थे, मेरा भी जामिया के ज़माने में उधर आना-जाना था. एक ही कमरे में छह-आठ लोग रहते थे. कुछ दिन में काम पर जाते तो कुछ रात में; बारी-बारी से सोते. कमरे के लिए दिन और रात में कोई फ़र्क़ न था. अंधेरा या उजाला, यहां रहने वाले अपनी बारी का इंतज़ार करते. नाइट ड्यूटी का फ़ायदा था, वर्ना अलग-अलग कमरों का किराया देना पड़ता.
दशकों बाद, सात समुंदर पार ये नज़ारा देख कर फिर से सब कुछ याद आ गया. ग़ौर से इस तस्वीर को देखिये, छत ओले पड़ने से ख़राब हो गई थी. आज पूरी छत बदली जा रही है. मज़दूर ऊंचाई पर चढ़ कर कोई करतब नहीं दिखा रहे, दो जून की रोटी के लिए अपना काम कर रहे हैं. कुछ गुनगुना भी रहे हैं, खुश हैं, मानो फैज़ का कलाम गा रहे हों “कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया”.



दशकों बाद, सात समुंदर पार ये नज़ारा देख कर फिर से सब कुछ याद आ गया. ग़ौर से इस तस्वीर को देखिये, छत ओले पड़ने से ख़राब हो गई थी. आज पूरी छत बदली जा रही है. मज़दूर ऊंचाई पर चढ़ कर कोई करतब नहीं दिखा रहे, दो जून की रोटी के लिए अपना काम कर रहे हैं. कुछ गुनगुना भी रहे हैं, खुश हैं, मानो फैज़ का कलाम गा रहे हों “कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया”.
इनमें से अधिकतर मैक्सिकन हैं, इतने ऊँचे मुक़ाम पर पहुँच चुके हैं. पर इनका जीवन, सुखदेव विहार के स्वास्थयकर्मियों से बहुत मिलता-जुलता है. लेकिन, जो फ़ैज़ का कलाम गाता हो उसका दिल खुशियों से भरा होगा. वो सबसे धनी है, धनवान होना सभों के नसीब में कहाँ… इसलिए तो मैंने अपनी साइकल का नाम धन्नो रखा था 😀
पेश है फ़ैज़ की नज़्म, आप भी गुनगुना सकते हैं, स्वास्थ्यकर्मी और मज़दूरों के लिए ताली और थाली दोनों बजा सकते हैं.
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ख़लीक़


वाह। क्या बात।