टीका-टिप्पणी

तस्वीरें बोलती नहीं, ताकने को मजबूर करती हैं. थाम लेती हैं, पलों को अपनी बाहों में. छायाकार को विवश कर देती हैं, कहती हैं, समय है यादगार बनाने का. कैमरा क्लिक-क्लिक करता हुआ हर समां को अपने अंदर समा लेना चाहता है. ढलता हुआ सूरज पल भर में अस्त होने वाला है. अंधकार का वर्चस्व बढ़कर, इस शाम को काली रात में बदल देगा. क्लिक-क्लिक करते करते, छायाकार ढलते सूरज को अलविदा कहना भूल गया.

मैंने कहा -“भूलने का बहाना अच्छा है, सच तो यह है कि, उसे ढलते हुए सूरज की परवाह ही कहाँ है!”

धन्नो बोली “छायाकार को बुरा बताने में एक पल भी देरी नहीं की. भूल गए हमारी तस्वीरें कौन लेता है! कैमरे की क्लिक-क्लिक में तुम्हें सूर्य नमस्कार की आवाज़ नहीं सुनाई दी!”

अंदर का कवि बोला “उगते सूरज को सब नमस्कार करते हैं, शायद इसलिए *क्लिक क्लिक * की आवाज़ का मतलब नहीं समझ पाया”

मैंने कहा “धन्नो तुमने कवि को, सच से रु-ब-रु करा दिया. टीका-टिप्पणी करने की आदत आम सी है, लेकिन हर किसी की अपनी अपनी समझ है. और समझ पूरी रखने का भ्रम रहता है”

सियह-बख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसाँ से
कैंसर-उल जाफ़री

ख़लीक़

Leave a Reply