हमारी नज़रों का क़ुसूर तो नहीं, पूरे होशो-हवास में हमने देखा। जब जमुना किनारे धन्नो के साथ सैर कर लौट रहा था, तो हमारी ऑंखें टिकी की टिकी रह गईं. जहां जमुना किनारे धन्नो खुश होकर, गंगा-जमुना और अपने मिलन के गीत गा रही थी
“तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा, हो रहेगा मिलन.. हमारा तुम्हारा”





धन्नो हमारे लिए ऊपर वाले का वरदान है। एक रूह, जो अप्सरा बनकर, कहीं भी साइकल में समा जाती है।
ये सब सोच ही रहा था कि हमारी अटकी हुई नज़रें, जैसे कह रही हों “हमारे प्यार को किसकी नज़र लग गई”।
जैसे धन्नो को किसी ने दीवार में चिनवा दिया हो! कौन है वो ज़ालिम, सामने तो आ भाई, हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा!
हम अपने ही देश में विदेशी की क़तार में खड़े होकर दाख़िल हुए। हमारे पूरे कागज़ात थे, अधिकारियों ने दिल्ली एयरपोर्ट पर अच्छी तरह जांच की, कुछ सवाल भी पूछे। अंत में वो भी हँसे, और हम भी। हमारी हँसी में कोई छलावा नहीं था। उधर धन्नो बिना कागज़ात के ही आ धमकी; हवाई जहाज़ के टिकट का भी कोई खर्चा नहीं। वैसे देश की सीमाओं को लांघ, प्यार की ख़ातिर यूँ भटकना! कुछ सुना-सुना सा लगता है। फिर अचानक यह प्रेम विवाद बनकर, ख़बर न बन जाये.
फ़िल्म के किरदार में बस हीरो और हीरोइन नहीं होते, विलेन भी होते हैं. विलेन को भी खुश हो जाने दो, उसको कहाँ पता, धन्नो के लिए साइकल का शरीर बदलने में दूसरा जन्म नहीं लेना पड़ता. दीवार में धन्नो को चिनवा कर विलेन भी खुश, और धन्नो भी।
ज़िल्ले-इलाही ने अनारकली को दिवारों में चिनवाने का फ़रमान सुनाया था, लेकिन मैं तो शाहज़ादा सलीम नहीं; फिर ये सज़ा क्यों? धन्नो को भी कितने इम्तिहान से गुज़रना होगा। धन्नो पहले ही, शोले की घोड़ी वाली पहचान से उबरने के लिए जूझती रही है, और अब एक नया झमेला, मुग़ल-ए-आज़म फिल्म की अनारकली वाली सज़ा।
धन्नो बोली ग़ालिब की दिल्ली में दिलवालों की क़द्र नहीं। चलो, हम मीर के शहर लखनऊ में मिलेंगे। मिलने वाले को कौन जुदा कर सकता है!
मैंने कहा धन्नो, “ध्यान रखना, वहां भी रोमियो और जूलियट को पकड़ने वाला दस्ता है.”
गो बे-सुतूँ को टाल दे आगे से कोहकन
संग-ए-गरान-ए-इश्क़ उठाया न जाएगा
मीर तक़ी मीर
ख़लीक़


बहुत सुंदर लेखन
एक प्रवासी के ह्रदय का उदगार 👌🏻👌🏻