कायनात की ख़ूबसूरती को आप कितनी ही खूबसूरती से बयां करना चाहें, अधूरा ही रह जाता है. इंसान के शब्दों में वो करिश्मा कैसे आ सकता है जो क़ुदरती हुस्न को हु बहु उतार सके. सुबह के चार बजे, चाँद दरीचे से झांक रहा था. हम एक टक देखने लगे, सोचा इस पल को क्यों न कैमरे में क़ैद करलें. आइ -फ़ोन कैमरे के साथ जुस्तुजू में लग गया, हू बहू चाँद को उतार सकूँ. कैमरा अच्छा नहीं था, कहना आसान होगा. लेकिन अगर कैमरा-मैन, फोटोग्राफी की अदा जानता तो बात थोड़ी सच लगती. कहते हैं न, नाच न जाने आँगन टेढ़ा. 

खिड़की के शीशे की करामात ने, शायद फ़ोटो को धुंधला कर दिया. यह भ्रम दूर करने के लिए, हम दरवाज़ा खोल कर खुले आसमान में जाकर, चाँद की तस्वीर निकालने लगे. क्लिक करते रहे, लेकिन हु बहु चाँद नहीं उतार पाए. शायद कैमरामैन और कैमरा दोनों को बेहतर होना होगा.कला प्रेम की जिज्ञासा और बेहतर करने की चाहत बनी रहनी चाहिए . शब्दों से तस्वीर बनाने का शौक़ बचपन से रहा है, लेकिन आज बार बार बस तस्वीर खींचने की कोशिश करता रहा. पिक्चर परफेक्ट बना पाने की जिज्ञासा कलाकार को ज़िंदा रखती है.
प्रकृति निराकार है और उसकी सृष्टि ही सम्पूर्ण है. इंसान तो बस सम्पूर्ण होने का भ्रम पाल सकता है, और भ्रम पालना भस्म हो जाने जैसा है.
रंग खुशबू में न अगर है तो हो जाए
वस्ल का ख़्वाब मुकम्मल हो जाए
परवीन शाकिर
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी
गुलज़ार
ख़लीक़ 
