थोड़ा ठहरो, मुझे भी आज मन की बात कहनी है”.
“क्यों हम साथ-साथ रफ़्तार में भागते हुए बातें कर सकते हैं.”
“अरे, वो मुझे भी पता है. मैं तो बुलडोज़र जी से बात करना चाहती हूँ. वो देखो साक्षात दर्शन हो गया उनका!”
धन्नो “तेरा इस तरह गैरों से बात करना, मुझे अच्छा नहीं लगता”
“अरे तुम आज इतने मीन माइंडेड क्यों हो रहे हो, तुम भी तो सामने से आती हुई बाइकर को दूर से ही हँस कर हेल्लो कहते हो, और मौक़ा मिलते ही, बातें करने लग जाते हो!”




“तू भी न धन्नो, इतनी सी बात पर ख़फ़ा होने लगती है, जा बुलडोज़र जी से, जी भरकर मन की बात कर ले”
धन्नो बुलडोज़र जी के क़रीब जा खड़ी हुई -“आपको नमन, मुझे पहचाना, मैं धन्नो.”
बुलडोज़र जी बोले “नाम सुना हुआ लगता है, और तुम्हारी शक़्ल भी जानी-पहचानी सी लगती है; तुम्हें कहीं देखा है.”
“याद आया, पार्टी के झंडे पर तुम्हारी तस्वीर थी. और तुम्हारे नाम से तो मुझे कुछ और भी स्मरण होने लगा है; पिछले जन्म में क्या तुम तांगा चलाती थीं?”
मैं बातें सुन रहा था, धन्नो ने मेरी तरफ़ देखा. उसे शायद बातें पसंद नहीं आईं. मानो नज़रें सवाल पूछ रही हों, उसे उसकी पहचान कब मिलेगी.काश मेरे पास धन्नो के सवाल का जवाब होता.
धन्नो ने बुलडोज़र जी को मुस्कुराते हुए जवाब दिया “मैं वो नहीं हूँ जो आप समझ रहे हैं. न तो मेरा झंडे के निशान से कोई तअल्लुक़ है, और न तांगे से. मैं एक आत्मा हूँ, जो साइकल के रूप में समा गई हूँ. मेरा एक प्रेमी है, वो मुझे प्यार से धन्नो बुलाता है.”
धन्नो मेरी ओर इशारे कर जैसे इतराने लगी, लगा बुलडोज़र जी को प्रेमी वाली बात पर थोड़ा अचरज हुआ.
धन्नो बोलती रही, “बुलडोज़र जी, मैं तो बस ठहर कर आपको शुक्रिया कहना चाहती थी. आपने कितनी मेहनत करके इस चौराहे पर ट्रैफ़िक लाइट लगवाया है. अब हम आराम से चौराहा क्रॉस कर पायेंगे.”
“वैसे बुलडोज़र जी, आपके बारे में भी कुछ सुना है, आप भी अक्सर ख़बरों में बने रहते हो.”
“ख़बर बनाने वालों पर हमारा कोई अधिकार नहीं, हम तो बस आदेश का पालन करते हैं”, बुलडोज़र जी बोले.
“सच कहा बुलडोज़र जी, जैसे मेरी शक्ल को निशान बना कर किसी ने झंडा बना डाला, उस पर मेरा क्या ज़ोर!” धन्नो बोली.
बुलडोज़र जी को अलविदा कह कर, धन्नो और हम अपनी आगे की मंज़िल को रवाना हो गए.
धन्नो “तुझे बुलडोज़र जी से ख़बरों वाली बात नहीं पूछनी चाहिए थी”
“अरे तुम इंसानों की तरह बेजान नहीं सोचते, हमारे अंदर कोई छल या टांग खींचने की कोई प्रवृत्ति नहीं होती. तुम अपनी सोच अपनी हद तक रखो”
मैंने कहा “अगर बुलडोज़र जी को सवाल पर गुस्सा आ जाता तो तेरा क्या होता, सोचा है!”
“बुलडोज़र जी को पता था, मैं साइकल की शक्ल में आत्मा हूँ, और हम पर शक्ति का कोई प्रभाव नहीं होगा”, धन्नो बोली.
“मैं तो इन्सान हूँ धन्नो” – मैं मन ही मन बशीर बद्र का शेर गुनगुना कर दुआएं मांगने लगा था.
कभी दिन की धूप में झूम के, कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ-साथ चलें सदा,कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
ख़लीक़


Maa sha Allah, excellent story.
Lajawab.kudos
Salamat rahiye bhai
Thank you for your encouraging words..