मैं फिर से अपने साइकल सवारी की कहानी सुनाने आगया. कुछ कहना अच्छा है, कोरोना काल ने हम सबको unsocial बनने का पूरा बहाना दे दिया है. लेकिन इस “कोरोना के रोना” को नकारना होगा, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इस कुदरती सव्भाव को कैसे कम किया जा सकता है. आधुनिक युग में socialize होने के बहुत सारे माध्यम हैं. वैसे आधुनिक युग में भाषा भी बदलती जा रही है, like, dislike और emojis का चलन है, chat में पूरा शब्द या वाक्य लिखना असाधारण सी बात है, जो भी है अच्छा है.. बोलते रहना चाहिए.



घर के पास ही यह लेक है, इसका नाम “Colby lake” है. दो मील ट्रेल से घिरी हुई यह लेक, शाम के समय यहाँ भीड़ बढ़ जाती है. आसपास के लोग टहलने, जॉगिंग करते और हमारे जैसे bikers काफी होते हैं. आजकल लोग रंग बिरंगे मास्क में चेहरे को छुपाय नज़र आते हैं. एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं मास्क से चेहरा छुपा होता है, फिरभी मुस्कुराने का आभास हो जाता है. मानो सब मुस्कुराकर यह कहना चाहते हैं हम सब इस दुख में साथ हैं और pandemic पे विजय पाएंगे
जयादा भीड़ का सामना न हो इसलिए शाम को जल्दी आने की कोशिश करता हूँ. पिछले कई सालों से मैंने इसके कई चक्कर लगाए हैं, इतने की गिनती भी याद नहीं. अनगिनत फेरों ने इस लेक से एक लगाव बना दिया. मानो लेक से “प्यार” होगया. अगर सप्ताह में 2, 3 दिन न आउँ तो मन उदास होने लगता है. मुझे लगा आज लेक मुझ से कुछ कह रही है, एकदम शांत है मानो उदास है. शांत रहना भी एक संकेत होता है.संकेत भी एक भाव है, जो बिना बोले कहा और सुना जाता है. आप जिसके जितना क़रीब होतें हैं, उसकी सांकेतिक भाषा उतनी जल्दी समझ पाते हैं.

