दाग़

दाग़ कितना भी छोटा हो, अपनी पहचान बनाए रखता है. नज़र उतारने वाला काला टीका अलग था, वो जो मां बचपन में नज़र उतारने के लिए रोज़ सुबह लगाती थी. शाम होते होते टीका कहीं ग़ायब हो जाता. टीका मिटकर मां को यक़ीन दिला जाता की उसने दिन भर हिफाज़त की, बच्चा हंसता खेलता रहा.

दाग़ अपनी जगह ख़ुद चुन लेता है, अपनी सहूलियत से. जाने अनजाने में आप दाग़ के लिए रास्ता बना देते हैं. जो बोया है वो ही उगेगा, नियम ऊपर वाले ने बनाया है. दाग़ अपने आप उभर आता है. जब आपका परिचय दाग़ से होता है, तो देर हो चुकी होती है. दाग़दार हो जाने की अपनी पीड़ा है. चेहरे का दाग़ हो या दामन का. आइने के सामने ख़ुद से ही नज़रें मिलाकर शर्मिंदा होना पड़ता है.

दामन पर लगा दाग़ दिखाई तो नहीं देता, लेकिन लोग भी कहाँ पीछे रहते हैं! आप पाक-साफ़ नहीं रहे, कलंकित महसूस करते हैं. जैसे हँसते-मुस्कुराते जीवन में किसी ने हस्तक्षेप कर दिया, आप दोषी हों या न हों, आरोप लग गया. अदालती फरमान आएगा, आपके दामन का दाग़ धुलेगा, यही उम्मीद आपकी हँसी वापिस करने का सहारा है. कहते हैं, बद अच्छा – बदनाम बुरा. लेकिन क्या करें, नेता तो हैं नहीं कह दें कि सारे आरोप राजनैतिक हैं.

दाग़ तो चाँद में भी है, लेकिन रोज़ चमकता है. चांदनी फैलाता है, उसे अपने दाग़ से कोई गिला नहीं. उसे पता है वो पाक-साफ़ है. हमारी अन्तरात्मा भी उतनी ही पाक है, एक दाग़ हमारी हंसी नहीं रोक सकता. दामन पर दाग़ लोग लगाते रहेंगे, हम चाँद की तरह रौशनी फैलाते रहेंगे.

अब चेहरे का दाग़ तो मां के काले टीके से मिल रहा है, मां रही नहीं तो रोज़-रोज़ टीका कौन लगाता. हां एक बात है दिल में दाग़ मत रखिए.

आख़िर में दाग़ का ये शेर अर्ज़ है

‘दाग़’ की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे
दाग़ देहलवी

ख़लीक़

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