शुभ चिंतकों के नाम पत्र

सच के होने का बोध कौन जान सकता है? वही जो सच का बोझ उठाये. सच के सवालों से घिर जाने पर, सारा रास्ता बंद हो जाता है. हिम्मत जुटा कर, और छाती फुलाकर सच का सामना करना होता है, अपना रास्ता खोलना होता है. इसके इलावा और कोई उपाय क्या है! ख़बरों में बने हुए हैं, लोग नज़रें गड़ा कर देख रहें हैं. दोस्तों को भी चैन तो नहीं ही है, मेसेज भेज कर पूछ रहे हैं, “कैसे हो, सब ख़ैरियत है, क्या चल रहा है”. हमारे शुभचिंतक हों या न हों चिंता सभी को है. लेकिन समस्या तो हमारी है, हल हमें ही ढूँढना है, सच का इम्तिहान भी कितनी बार देना होगा!

हम भी डटे हैं सपरिवार, पूरे साज़ो सामान से लैस, सच का बोझ उठा कर दूर हटा रहे हैं. रास्ता बनाने की कोशिश जारी है, परिवार का सहारा सबसे बड़ा है, हम कामयाब होते जा रहे हैं. रास्ता बन रहा है.

बात बस इतनी सी है, फरवरी के अंत में रिकॉर्ड बर्फ़ पड़ी है. अपने बीस साल के काल में मैंने पहली बार अनुभव किया है.अपने घर के बाहर की ड्राइव-वे पर 20 फुट बर्फ़, जैसे सच का पहाड़ खड़ा हो गया था. हमसे सवाल पूछ रहा था, सच का सामना कर पाओगे? हमने भी बुलडोज़रनुमा छोटे आकार की मशीन से, जिसे स्नो ब्लोअर कहते हैं, पहाड़ का सामना कर उसे काट-काट कर दूर फ़ेंक दिया.

सच को सच से क्या डर, बस थोड़ा कमर में दर्द है, लेकिन समय के साथ सब ठीक हो जायेगा. 
ख़लीक़ 

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