डिजिटल युग का प्यार

ये कौन सा गुलाब है जिसमें कोई खुशबू नहीं! कहीं से आया, फिर कहीं और भेज दिया, मतलब फॉरवर्ड कर दिया. गुलाब प्यार का प्रतीक बनकर बार-बार एक जगह से दूसरी जगह टहल रहा है. इस डिजिटल युग में टहलने का कोई खर्चा भी नहीं है. गुलाब को टहलने में, मज़ा आ रहा होगा या दुःख, ये तो पता नहीं.

ऐसा प्रतीत होता है इसे थामने के लिए कोई तैयार नहीं, इसकी क़िस्मत में फॉरवर्ड होना ही लिखा है. संयोगवश अनगिनत बार फॉरवर्ड होते रहने के क्रम में, फिर वापस उसी व्यक्ति विशेष के फ़ोन तक पहुँच जाता है, जहां से चला था. आखिर अपने पहले प्यार के पास लौट आया. या यूँ कहें कि गुलाब के सफ़र से डिजिटल युग में डिजिटली सिद्ध हो गया कि दुनिया गोल है.

इसे कहते हैं ‘बाल की खाल निकालना‘, नाज़ुक पंखुरी तक को नहीं बख़्शा. मीर अगर होते तो आज गुलाब देख कर क्या ये शे’र कहते:

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है!

वैसे परवीन शाकिर के इस शे’र में फूल पर उठा मसला हल हो गया, फूल वापिस अपने फ़ोन में आ गया.

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है, फूल किधर जाएगा!

ना नाज़ुकी बची न खुशबू, डिजिटल युग का अनोखा प्यार, हाँ इसे ही बदलाव कहते हैं.
ख़लीक़ 

This Post Has 2 Comments

  1. Vijay

    The feeling behind the flower r the magic.
    Spread as mush as possible.
    V r able to feel your creative emotions
    Gr8

    1. Khalique Wajidi

      sir appreciate your feedback, this means a lot for the pen.

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