स्नो-मैन

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थोड़ी धूप निकली और तापमान ज़ीरो के ऊपर जाते ही, पुतला पतला होने लगा. सूरज की रौशनी थोड़ी तेज़ क्या हुई, उसके पूरे बदन से रिसाव होने लगा. अभी दो सप्ताह पहले ही उसे कितने उत्साह से, बच्चों ने मिलकर आदमी की शक्ल दी थी. स्नो सहेज कर, सर से पैर तक सफ़ेद, साथ में गाजर से बनी नाक वाला आदमी बनाया था. मासूम हाथों की कला, सफ़ेद बर्फ़ में जैसे सच का वास हो. चलो इसे सच्चा आदमी पुकारते हैं, लेकिन काश यह बोल सकता!

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चोर बोले ज़ोर से

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देर रात नींद का खुलना एक आम सी बात है, लेकिन फिर नींद का न आना बेचैन करता है. बिस्तर पर पड़े रहकर, लेटे रहने का बहाना करें. या फिर उठकर, समय का सदुपयोग. लेकिन. ये डर भी लगा रहता है की, क़दमों की आहट. या हॉल में बल्ब जलाने से, किसी की नींद न ख़राब हो जाए. दबें पांव चलकर ऐसा लगता है, जैसे कोई चोर घुस आया हो. लेकिन अपने ही घर में ख़ुद को चोर बुलाना शायद अनुचित होगा. अगर हमारी हरकतों की वजह से कोई जग भी गया तो कह देंगे , "हाँ मैं, हूँ नींद खुल गई थी"

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दिल तो है

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धन्नो के लिए आज का दिन अच्छा था. अकेलापन और खामोशी की जैसे आदत सी हो गई हो. सुबह हई, तो खिड़की से झील की सफ़ेद चादरों को देख, इशारों इशारों में सही, झील से बातें करना. एकांत में, कोई तो है, जिनसे बिना कुछ कहे, कुछ कह लेती है.धन्नो बोल पड़ी,झील, हमारा तुम्हारा दर्द एक सा ही हैना। मौसम की मार ने कितना तनहा कर दिया हमें. झील ने कहा अपना ग़म बस अपना होता है, लेकिन कोई साथ हो तो ढारस रहता है, की बस मैं ही तो नहीं. वक़्त है गुज़र ही जायेगा. ग़ालिब का क़ौल याद आगया “जब ख़ुशी ही न ठहरी तो ग़म की क्या औक़ात“

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