देर रात नींद का खुलना एक आम सी बात है, लेकिन फिर नींद का न आना बेचैन करता है. बिस्तर पर पड़े रहकर, लेटे रहने का बहाना करें. या फिर उठकर, समय का सदुपयोग. ये डर भी लगा रहता है की, क़दमों की आहट. या हॉल में बल्ब जलाने से, किसी की नींद न ख़राब हो जाए. दबें पांव चलकर ऐसा लगता है, जैसे कोई चोर घुस आया हो. लेकिन अपने ही घर में ख़ुद को चोर बुलाना शायद अनुचित होगा.
फिर उठने का आईडिया तर्क कर, सोंचा, लेटे लेटे कुछ ज्ञान ले लूँ. “नींद खुलने पर कवी क्या सोंचते हैं”. ज्ञान को साझा करने से ज्ञान बढ़ता है. इसलिए साझा करना ज़रूरी है

नींद क्यूँ टूट गई आख़िर-ए-शब
कौन मेरे लिए तड़पा होगा
अंजुम लुधियानवी
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
इक़बाल अशहर
नींद से उठ कर वो कहना याद है
तुम को क्या सूझी ये आधी रात को
अहमद हुसैन माइल
चलो अच्छा हुआ आख़िर तुम्हारी नींद भी टूटी
चलो अच्छा हुआ अब तुम भी ख़्वाबों से निकल आए
ख़ुशबीर सिंह शाद
गूगल बाबा का जितना भी धन्यवाद करूँ कम है, वरना रात गुज़ारना महाल था. दबे पाँव चलकर चोरों जैसी हरकत और फिर किसी की नींद खुल जाती, तो ज़ोर से कहना होता “अरे मैं हूँ”,
जवाब मिलता धीरे बोलो “चोर बोले ज़ोर से, बच्चे सो रहे हैं”
©ख़लीक़

