दाग़
दाग़ कितना भी छोटा हो, अपनी पहचान बनाए रखता है. नज़र उतारने वाला काला टीका अलग था, वो जो मां बचपन में नज़र उतारने के लिए रोज़ सुबह लगाती थी. शाम होते होते टीका कहीं ग़ायब हो जाता. टीका मिटकर मां को यक़ीन दिला जाता की उसने दिन भर हिफाज़त की, बच्चा हंसता खेलता रहा. दाग़ अपनी जगह ख़ुद चुन लेता है, अपनी सहूलियत से. जाने अनजाने में आप दाग़ के लिए रास्ता बना देते हैं. जो बोया है वो ही उगेगा, नियम ऊपर वाले ने बनाया है. दाग़ अपने आप उभर आता है. ...

