पिक्चर परफेक्ट
कायनात की ख़ूबसूरती को आप कितनी ही खूबसूरती से बयां करना चाहें, अधूरा ही रह जाता है. इंसान के शब्दों में वो करिश्मा कैसे आ सकता है जो क़ुदरती हुस्न को हु बहु उतार सके. सुबह के चार बजे, चाँद दरीचे से झांक रहा था. हम एक टक देखने लगे, सोचा इस पल को क्यों न कैमरे में क़ैद करलें. आइ -फ़ोन कैमरे के साथ जुस्तुजू में लग गया, हू बहू चाँद को उतार सकूँ. कैमरा अच्छा नहीं था, कहना आसान होगा. लेकिन अगर कैमरा-मैन, फोटोग्राफी की अदा जानता तो बात थोड़ी सच लगती. कहते हैं न, नाच न जाने आँगन टेढ़ा.

