मैं समय हूँ

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"मै समय हूँ, मेरा कोई अंत नहीं" महाभारत के टीवी सीरियल की यह आवाज़ अब भी कानों में गूंजती है. समय रुकता नहीं, लेकिन शनिवार रात सात सात घड़ियों की सुई को रोक कर पीछे कर रहा था. हर घड़ी की सुई एक घंटा पीछे कर असीम दैवी शक्ति का आभास हो रहा था , जैसे समय पर मेरा अधिकार हो.

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दाग़

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दाग़ कितना भी छोटा हो, अपनी पहचान बनाए रखता है. नज़र उतारने वाला काला टीका अलग था, वो जो मां बचपन में नज़र उतारने के लिए रोज़ सुबह लगाती थी. शाम होते होते टीका कहीं ग़ायब हो जाता. टीका मिटकर मां को यक़ीन दिला जाता की उसने दिन भर हिफाज़त की, बच्चा हंसता खेलता रहा. दाग़ अपनी जगह ख़ुद चुन लेता है, अपनी सहूलियत से. जाने अनजाने में आप दाग़ के लिए रास्ता बना देते हैं. जो बोया है वो ही उगेगा, नियम ऊपर वाले ने बनाया है. दाग़ अपने आप उभर आता है. ...

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शुभ चिंतकों के नाम पत्र

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सच के होने का बोध कौन जान सकता है? वही जो सच का बोझ उठाये. सच के सवालों से घिर जाने पर, सारा रास्ता बंद हो जाता है. हिम्मत जुटा कर, और छाती फुलाकर सच का सामना करना होता है, अपना रास्ता खोलना होता है. इसके इलावा और कोई उपाय क्या है! ख़बरों में बने हुए हैं, लोग नज़रें गड़ा कर देख रहें हैं. दोस्तों को भी चैन तो नहीं ही है, मेसेज भेज कर पूछ रहे हैं, "कैसे हो, सब ख़ैरियत है, क्या चल रहा है". हमारे शुभचिंतक हों या न हों चिंता सभी को है. लेकिन समस्या तो हमारी है, हल हमें ही ढूँढना है, सच का इम्तिहान भी कितनी बार देना होगा!

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