गंगा जल
धन्नो आज 15 मील भाग कर थक सी गई, फ़व्वारे के पास आकर रुक गई. पानी के छींटे उड़ कर धन्नो को छू रहे थे. धन्नो को भी जैसे भीगने का मौक़ा मिल गया हो. मैंने कहा - "धन्नो तू बस फ़व्वारे को देख कर रुकी थी! मुझे तो लगता है तू भी अब धार्मिक प्रवृत्ति की होती जा रही है". "कभी-कभी तुम भी ना! बेतुकी बातें करते हो; तुम्हें पता है ना, मैं नास्तिक हूँ".

