ताली और थाली

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दिल्ली में, सुखदेव विहार के आस पास स्वास्थ्यकर्मी रहते थे, मेरा भी जामिया के ज़माने में उधर आना-जाना था. एक ही कमरे में छह-आठ लोग रहते थे. कुछ दिन में काम पर जाते तो कुछ रात में; बारी-बारी से सोते. कमरे के लिए दिन और रात में कोई फ़र्क़ न था. अंधेरा या उजाला, यहां रहने वाले अपनी बारी का इंतज़ार करते. नाइट ड्यूटी का फ़ायदा था, वर्ना अलग-अलग कमरों का किराया देना पड़ता.

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अनुदान राशि

ट्रेन के डिब्बे से दूर गिरी लाश ने पूछा- "भाई, इतना हंगामा क्यों है? मौत तो एक आम सी घटना है" पास पड़ी दूसरी लाश बोली "भाई, घटना नहीं दुर्घटना है; अकस्मात ही हम लाश बन गए यमराज ओवरटाइम कर गए। शायद, उन्हें अवकाश पर जाना था; अपना काम पहले निपटाना था।"

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टीका-टिप्पणी

तस्वीरें बोलती नहीं, ताकने को मजबूर करती हैं. थाम लेती हैं, पलों को अपनी बाहों में. छायाकार को विवश कर देती हैं, कहती हैं, समय है यादगार बनाने का. कैमरा क्लिक-क्लिक करता हुआ हर समां को अपने अंदर समा लेना चाहता है. ढलता हुआ सूरज पल भर में अस्त होने वाला है, अंधकार का वर्चस्व बढ़कर इस शाम को काली रात में बदल देगा. क्लिक-क्लिक करते करते छायाकार ढलते सूरज को अलविदा कहना भूल गया. मैंने कहा -"भूलने का बहाना अच्छा है, सच तो यह है कि उसे ढलते हुए सूरज की परवाह ही कहाँ है!"

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