टीका-टिप्पणी
तस्वीरें बोलती नहीं, ताकने को मजबूर करती हैं. थाम लेती हैं, पलों को अपनी बाहों में. छायाकार को विवश कर देती हैं, कहती हैं, समय है यादगार बनाने का. कैमरा क्लिक-क्लिक करता हुआ हर समां को अपने अंदर समा लेना चाहता है. ढलता हुआ सूरज पल भर में अस्त होने वाला है, अंधकार का वर्चस्व बढ़कर इस शाम को काली रात में बदल देगा. क्लिक-क्लिक करते करते छायाकार ढलते सूरज को अलविदा कहना भूल गया. मैंने कहा -"भूलने का बहाना अच्छा है, सच तो यह है कि उसे ढलते हुए सूरज की परवाह ही कहाँ है!"

