टीका-टिप्पणी

तस्वीरें बोलती नहीं, ताकने को मजबूर करती हैं. थाम लेती हैं, पलों को अपनी बाहों में. छायाकार को विवश कर देती हैं, कहती हैं, समय है यादगार बनाने का. कैमरा क्लिक-क्लिक करता हुआ हर समां को अपने अंदर समा लेना चाहता है. ढलता हुआ सूरज पल भर में अस्त होने वाला है, अंधकार का वर्चस्व बढ़कर इस शाम को काली रात में बदल देगा. क्लिक-क्लिक करते करते छायाकार ढलते सूरज को अलविदा कहना भूल गया. मैंने कहा -"भूलने का बहाना अच्छा है, सच तो यह है कि उसे ढलते हुए सूरज की परवाह ही कहाँ है!"

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चांद

कवि की टोपी उतार कर छायाकार की टोपी पहन ली. ऐसा लगा जैसे वेजेटेरियन हो गए. हसीनाओं को सपनों में नहीं साक्षात् दर्शन कर कैनवास पर उतारूंगा. ऐसे में वेजेटेरियन बने रहना अच्छा है, वर्ना मनचला कवि कहेगा बिरयानी लाओ, मतलब हसीना मान जाओ कैनवास से बाहर आओ. छायाकार आसमान में चौदहवीं के चाँद की ओर देखे जा रहा था. ध्यान लगा कर शॉट लेता रहा. हू बहू चाँद को क़ैद कर लेने की आस. वहीं मनचला कवि चाँद को ख्यालों में, हसीना के क़दमों में डालने की बातें करने लगा. छायाकार बोला पहले चाँद को आसमान से तो उतारने दो कविराज, मेरे कैनवास और तुम्हारी हसीना के क़दमों तक ले जाने की बात को थोड़ी देर के लिए विराम देते हैं.

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गंगा जल

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धन्नो आज 15 मील भाग कर थक सी गई, फ़व्वारे के पास आकर रुक गई. पानी के छींटे उड़ कर धन्नो को छू रहे थे. धन्नो को भी जैसे भीगने का मौक़ा मिल गया हो. मैंने कहा - "धन्नो तू बस फ़व्वारे को देख कर रुकी थी! मुझे तो लगता है तू भी अब धार्मिक प्रवृत्ति की होती जा रही है". "कभी-कभी तुम भी ना! बेतुकी बातें करते हो; तुम्हें पता है ना, मैं नास्तिक हूँ".

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