आग

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गुब्बारे की उड़ान देख धन्नो का ध्यान अटक गया. रंगबिरंगा गोला, कुछ आवाज़ें, और हवा से कर रहा था बातें. उसी दिशा में हम भी भागने लगे, जिधर गुब्बारा जा रहा था. उड़ने के लिए ऊर्जा चाहिए, गुब्बारे में आग जल रही थी. सवार लोग उत्साहित होकर तरह तरह की आवाज़ें निकाल रहे थे. जैसे धन्नो को सब कुछ पता हो, गुब्बारा नीचे उतरने वाला था, और हम भी वहां पहुंचने के लिए रास्ता ढूंढने लगे. सड़क के बीचो बीच गुब्बारा उतरने लगा, दोनों ओर से गाड़ियां रुक गयीं. धीरे धीरे गुब्बारा सिकुड़ने लगा, फिर धराशाई होगया. पूरा क्रू उसे समेटने में लगा था, लोग खड़े होकर नज़ारा देख रहे थे. काफ़ी ख़ुशी का माहौल था, बच्चे तालियां बजा रहे थे, मानो उनकी ईद होगई.

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ताली और थाली

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दिल्ली में, सुखदेव विहार के आस पास स्वास्थ्यकर्मी रहते थे, मेरा भी जामिया के ज़माने में उधर आना-जाना था. एक ही कमरे में छह-आठ लोग रहते थे. कुछ दिन में काम पर जाते तो कुछ रात में; बारी-बारी से सोते. कमरे के लिए दिन और रात में कोई फ़र्क़ न था. अंधेरा या उजाला, यहां रहने वाले अपनी बारी का इंतज़ार करते. नाइट ड्यूटी का फ़ायदा था, वर्ना अलग-अलग कमरों का किराया देना पड़ता.

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अनुदान राशि

ट्रेन के डिब्बे से दूर गिरी लाश ने पूछा- "भाई, इतना हंगामा क्यों है? मौत तो एक आम सी घटना है" पास पड़ी दूसरी लाश बोली "भाई, घटना नहीं दुर्घटना है; अकस्मात ही हम लाश बन गए यमराज ओवरटाइम कर गए। शायद, उन्हें अवकाश पर जाना था; अपना काम पहले निपटाना था।"

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