(Bike series)
इस साल धन्नो को Markgrafs Lake पसंद है, घर के पास है तो अकसर यहीं ले आती है. लगभग पुरे एक चक्कर के बाद, यह बेंच दिखती है. अक्सर यहीं बैठ कर अपनी बड़बड़ को क़लम बंद करता हूँ.आपको भी बोर करता हूँ, आप फिर भी पढ़ते हैं, इसका शुक्रिया अदा करना भी ज़रूरी है.




बड़बड़ शब्द हट जाये और सोंचता हूँ आपको अपनी बात चीत में शामिल कर पाऊँ. लेकिन ऐसा तो ग़ालिब ही कर पाय थे “मोरासले को मोक़ालमें में बदलना”. उनकी क़लम का जादू मुझ जैसे Kindergartener के लिए सोंचना भी ऐसा ही है जैसे कहूं, के मैं चाँद को ज़मीन पे ले आऊंगा. ख़ैर आदमी अपने जीवन में एक एक पायदान चढ़ता हुआ ही आगे बढ़ता है.
यह हरी बेंच में, ज़रूर कोई जादू है कुछ न कुछ लिखने के लिए विवश करती है. कल भी इधर से गुज़रा था, लेकिन बैठ न पाया क्योंकि बेंच पे एक जोड़ा पहले से बैठा था. मैंने तिरछी नज़र से देखा, फिर तेज़ी से निकल गया. शायद उन्होंने नोटिस भी न किया हो. बेंच कोई सत्ता की कुर्सी नहीं जो मेरा ही कब्ज़ा हो जाए. आज बिलकुल शांत और एकांत है, सामने झील का कल कल करता पानी बह रहा है, ऐसे में शब्द अपने आप भी बहने लगते हैं.
बारिश होने वाली है, क़लम को यहीं विराम लेना पड़ेगा, इसलिए विदा लेता हूँ . बस धन्नो के साथ भीग न जाऊँ. जाते जाते एक गाना याद आगया “मेरी छतरी के नीचे आजा…”

