स्नो-मैन

थोड़ी धूप निकली और तापमान ज़ीरो के ऊपर जाते ही, पुतला पतला होने लगा. सूरज की रौशनी थोड़ी तेज़ क्या हुई, उसके पूरे बदन से रिसाव होने लगा. अभी दो सप्ताह पहले ही उसे कितने उत्साह से, बच्चों ने मिलकर आदमी की शक्ल दी थी. स्नो सहेज कर, सर से पैर तक सफ़ेद, साथ में गाजर से बनी नाक वाला आदमी बनाया था. मासूम हाथों की कला, सफ़ेद बर्फ़ में जैसे सच का वास हो. चलो इसे सच्चा आदमी पुकारते हैं, लेकिन काश यह बोल सकता! 

अपने अंदर सच छुपा कर, न कह पाने का कष्ट, इसे भी सताने लगा. शायद, आँखों से आंसू निकालने से कष्ट नहीं कम होता. वो सूरज के आगे रौशनी में धीरे-धीरे रिसने लगा,जैसे अब उसका अस्तित्व ही दाँव पर लग गया हो. पिघल कर रिसते हुए, ग़ायब होता जा रहा है. प्रतीकात्मक सन्देश समझने के लिए धन्नो के साथ रूक कर मैं भी, रिसते हुए पानी को बून्द-बून्द गिरते देख रहा था. सच से बना पुतला सच को मायूस कर ख़ामोशी से अलविदा कह रहा है. मासूम बच्चे भी जमा होने लगे, सबकी ज़ुबान पर एक आवाज़ थी “oh man!, our snow man is dying.”

एक अच्छी बात है, मरते हुए स्नो-मैन को अंतिम संस्कार की कोई ज़रूरत ही नहीं होगी. आदमी खुद पानी बन गया. अंत भला तो सब भला, कम से कम चार कंधो के लिए राह देखने की ज़रूरत नहीं. पंचतत्व में अपने आप ही विलीन हो गया. वर्ना जीते जी जिससे मिलने की लालसा लिए दुनिया से चल बसा, उसे भी घड़ियाली आंसू बहाते हुए मुर्दा बनकर देखना होता. सच, ऊपर वाले ने हर किसी को कोई न कोई वरदान दिया है.

अलविदा स्नोमैन.

©ख़लीक़

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