(Bike series)
यह तस्वीर खींचते समय जोड़े में से एक ने झपट्टा मारा, मैं थोड़ा पीछे हट गया. आए दिन कोई न कोई फोटो खींचता रहता होगा, इनकी भी कोई प्राइवेसी है. परिवार की इस तरह बिना इजाज़त फोटो निकालना इनको अच्छा नहीं लगा. कहीं इनके बच्चों (जो की पुरे आठ) को नज़र न लग जाए




आजके समाज की इस पीढ़ी में “हम दो हमारे दो” वाला फार्मूला बहुत popular हुआ. दो साल के अंतर पे दो बच्चे, “छोटा परिवार सुखी परिवार”. मतलब परिवार हम दो हमारे दो से, शुरू होकर लगभग, वहीं ख़तम होने जैसा लगता है. आधुनिक युग की मजबूरी है, ग्लोबल होगये हम. गांव से शहर, शहर से बड़े शहर, देश से विदेश दूर दूर तक बिखर गए. जैसे बच्चों के लिए परिवार तो, बस चार लोगों से आगे बढ़ न पाया. माँ, बाप और दो भाई बहन. कई साल पहले जब मैं ने अपने बेटे को दरभंगा में पहली बार अपने घर ले गया तो वोह बोल पड़ा, “This is your Dad’s house, correct”.
बेटा ग़लत तो नहीं बोल रहा था, बिलकुल technically correct वक्तव्य था. मेरे पिताजी का स्वर्गवास मेरे बचपन में ही होगया था, जब मैं कॉलेज में पढता था. बेटे ने अपने दादाजी को तस्वीरों में ही देखा था. आजके युग में, उसको जितना लगाव रिश्ते से हो पाया, रिश्ते का सच बोल पड़ा.
हमारे बचपन के दिनों में, संयुक्त परिवार का अपना ही मज़ा था, घर में एक क्रिकेट टीम बन जाती थी.साथ सकूल जाना एक ही रिकशे में 10 बच्चे, कुछ सीट पे, कुछ सामने वाली बेंच से लटके हूए. परीक्छा के समय, ज़ोर ज़ोर से पढ़ने का चलन. चाचा कहते, अमजद साहेब के घर से पढ़ने की आवाज़ सुबह 5 बजे से आने लगती है. फिर अगले दिन हम में से एक 5 बजे उठ के पड़ने लगता. फिर अगले दिन से सारे बच्चे सुबह 5 बजे उठ के पढने लगते.
संयुक्त परिवार में ख़ुशी और ग़म भी संयुक्त होता था. सब एक साथ मुश्किल वक़्त का मुक़ाबला करते. एक दूसरे का सहारा बनते. खुशियां भी साथ मनाते. हाँ आमदनी कम थी, साल में बस तीन जोड़े कपडे, बस ईद पे नए सैंडल. लेकिन खुशियां बेशुमार. आज के छोटे परिवार में घर में चीज़ों की भरमार है. आदमी गिनती के हैं, और खुशियां भी गिनती की. दुःख में, कोई साथ रोने वाले का भी, इंतज़ार रहता है.
खुशीयां भी ग्लोबल रीती रिवाज के हिसाब से हो गई हैं. जनम दिन पे केक, शादी की सालगिरह की भव्य पार्टी. पसंदीदा हॉलिडे स्पॉट. उन सबके साथ अगर Fake Book (मतलब फेसबुक) पर फोटो upload न हुई मतलब जश्न पूरा नहीं हुआ. लोगों को कैंसे पता लगेगा की हमने खुशयां मनाईं. किसके कितने लाइक आए, फोटो देखकर क्या कमेंट किया. मानो खुशीआं भी सोशल मीडिया पे virtual होगयीं. आप सोंच रहे होंगे हमारे विचार कितने obsolete हैं. लेकिन वोह तो लेखक का विचार है. मैंने भी खूब सारी photos FaceBook पे साझा की हैं.
कई दिनों पहले हमारे घर के बैकयार्ड वाली झील से जोड़ी पंछियों के साथ, कई बच्चे भी दिखाई दिए. कई बार गोल फिर के पास आ जा रहे थे, कैमरे में क़ैद करना चाहा, तब तक दूर निकल गए. आज धन्नो के साथ जा रहा था, तो फिर नज़र आए. मैं रुक कर तस्वीर निकालने लगा. जोड़े में से एक मुझ पे झपट पड़ा शायद उसको अच्छा नहीं लगा मानो तस्वीर निकाल कर उनके परिवार को नज़र लग जाए गी. बोल रही हो “मेरे आठ बच्चों के परिवार की ज़िम्मेदारी मेरी है.तुम अपने हम दो हमारे दो वाले छोटे परिवार के साथ खुश रहो”.


Photos of birds
Very different view point. We are extremely careful while taking photos of locals in middle East – we avoid keeping locals in frame without their specific permission. But never thought of this angle. Loved to read. 👏👏
Glad to hear your feedback, well as a human we tend to be self-centric, evolution of nuclear family is some-what related as well. Thank you for your time for reading this story.
Apni aawaz har insaan ko sunai deti hai
Par jo dusre ki aawaz sun kar samajh le wo ho asal main insaan hai.
Aapki peshakash dusri line se mail khati hai.
So kabile taareef hai aap