कवि की टोपी उतार कर छायाकार की टोपी पहन ली. ऐसा लगा जैसे वेजेटेरियन हो गए. हसीनाओं को सपनों में नहीं साक्षात् दर्शन कर कैनवास पर उतारूंगा. ऐसे में वेजेटेरियन बने रहना अच्छा है, वर्ना मनचला कवि कहेगा बिरयानी लाओ, मतलब हसीना मान जाओ कैनवास से बाहर आओ. छायाकार आसमान में चौदहवीं के चाँद की ओर देखे जा रहा था. ध्यान लगा कर शॉट लेता रहा. हू बहू चाँद को क़ैद कर लेने की आस. वहीं मनचला कवि चाँद को ख्यालों में, हसीना के क़दमों में डालने की बातें करने लगा. छायाकार बोला पहले चाँद को आसमान से तो उतारने दो कविराज, मेरे कैनवास और तुम्हारी हसीना के क़दमों तक ले जाने की बात को थोड़ी देर के लिए विराम देते हैं.




कवि बोला मुझे अपनी टोपी पहन लेने दो, आराम हराम है. टोपी पहनी मंत्र पढ़ा “जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि”, ख्यालों में उड़ कर चाँद को मुटठी में पकड़ कर, हसीना के क़दमों में डाल दिया.
छायाकार बोला “लाजवाब, ये सीन कैनवास पर और ख़ूबसूरत लगेगा”. छायाकार और कवि की दोस्ती होगई.
मन के अंदर का आम इन्सान, कलाकारों के बहस और दोस्ती के बीच मौन था. अंदर के कलाकारों का बसेरा उसे कभी तनहा नहीं रहने देता. अपने अंदर कितना कुछ है, बस ढूंढने के लिए वक़्त चाहिए, लेकिन वक़्त मिलता ही नहीं.
ब-क़द्र-ए-पैमाना-ए-तख़य्युल सुरूर हर दिल में है ख़ुदी का
अगर न हो ये फ़रेब-ए-पैहम तो दम निकल जाए आदमी का
जमील मज़हरी
ख़लीक़


वाह क्या लिखा है!
आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत आभार, पाठक सर. आपके लेखन से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है