खंजर

सरदी का मौसम, और दिसंबर का महीना, बहते पानी को भी रोक देता है. जमा हुआ पानी बर्फ़ बनने लगता है. मैं बर्फ़ बनगई, थम गई. फिर भी, कभी कभी चहल पहल होती है. जमी हुई बर्फ़ और सर्द हवा, कुछ पंछी, खेल रहे थे. कभी उड़ जाते, फिर मँडराके वापिस आते, और बर्फ के बिछे फ़र्श पे कुछ चुगने लगते. हमारे एकांत को मिटाने वाला कोई तो था. मानो पंछियों का भी जी नहीं भरा, इतनी सरदी में भी साथ थे, उनके साथी गरम प्रदेशों को कूच करगए. मैंने भी प्यार बाँटने में कमी नही की, पंछी हो या इन्सान. शायद ये पंछी मुझ में, अपनी माँ जैसा प्यार देख रहे थे, और ठण्ड में मेरा साथ देना चाह रहे थे.

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तभी एक आदमी नीचे उतरा. उसके हाथ में snow scrapper था. पास आके, उसने पानी के तल, जो बिलकुल बर्फ बनगई थी, ज़ोर से वार किया. ख़ंजर जैसी धार मुझे चुभने लगी. फिर वोह मारता ही रहा. देखना चाहता था की मैं पूरी तरह साक़ित हूँ या अब भी जान है. मैं ज़ोर ज़ोर से कराह रही थी. मेरी कराह सुनके पंछी, डरके मारे उड़ गए. आसमान में मंडराने लगे मानो मदद की गुहार लागा रहे हों. लेकिन आदमी को कुछ एहसास नहीं हुआ. न मेरा रोना सुन पा रहा था, न पंछियों का डर जाना. मुझे कुरेदता रहा, एक किनारे से दूसरे किनारे तक. असहाय पंछी खंजर का नज़ारा देखते रहे, फिर दूर चले गए, आँखों से ओझल होगये, और में “अडोल” ज़ुल्म सहती रही.

प्रकिरती का नियम भी अजीब है. वही इन्सान जो हमें इतने प्रेम भाव से देखता था. बग़ल की walking trail से गुज़रता, तो मुझे ही निहारता, घूरता. मैं भी आंख मिचौली खेलती. खुद पे इतराती, की हमारे चाहने वाले दिन भर फिरते रहते हैं, फोटो भी खिचाते हैं. आज मौसम की मार से मेरी खूबसूरती को ग्रहण लग गया. आस पास के झूमते पेड़, जो कभी रंगीन थे, आज झाड़ में बदल गए. लोग भी मनचले आशिक़ की तरह थे, ज़रा मौसम क्या बदला, मुझे अधमरा समझ कर, मुझे भेद देने आये थे. लहू लहान करदिया और, मेरा ख़ून भी नज़र नहीं आया. वाह रे इन्सान.

समय बदलता है, हालात बदलते हैं. देखते देखते सर्दी कम होने लगी , बर्फ पिघलने लगी, और साफ़ पानी नज़र आने लगा. पेड़ों पे हरे पत्ते आने लगे, समां फिर से खुश गवार होने लगा. पानी फिर अपनी रफ़्तार में झील में बहने लगा. लोग भी पास, की ट्रेल पे टहलने को आते, और टकटकी लगाए झील को देखते. चिरयां भी वापिस आ गयीं और झुंड के साथ झील में जल-क्रीड़ा करतीं. मानो अब फिर से खुशियां लौट आईं.

एक दिन दोपहर का समय था, पंछीयों का हुजूम था. आपस में सब खेल रहे थे. फिर अचानक शोर करने लगे, थोड़े उड़के पास वाली ट्रेल पे पहुँच गए. “कायें कायें” की आवाज़ गूंजने लगी. मैं खिड़की के पास आया, की देखूं शोर कैसा है. देखता हूँ आदमी को कुछ पंछी घेरे हुए हैं. आदमी सहमा सा, पंछियों से घिरा, असहाय दिख रहा था.

झील भी, अपने पानी की रफ़्तार के साथ मगन थी. फिर इतने शोर ने उसका भी ध्यान खिंचा. ज़ोर से बोली “अकेले इन्सान को क्यों घेर कर डरा रहे हो”. झील के पास एक परिंदा आया. बोला याद है, इसी इन्सान ने आपको खंजर से लहुलहान किया था.आप रोती रहीं, और इसको आवाज़ भी नहीं सुनायी दी. इसे तो ice skating करना था आपके छाती पे कूदना था. एसे स्वारथी को मज़ा चखाना ज़रूरी है.

झील चुप चाप सुनती रही. फिर बोली, बुराइ का बदला बुराई से देने में, खुद भी बुरा बन जाना होता है. हमको प्रकीर्ति ने बनाया, और यही सिखाया है. पीछे हट जाओ. चिरयों ने, एक एक कर, वहां से हटना ठीक समझा. झील ने फिर उस आदमी को पास बुलाया. बोला पास आओ, एकदम पास, गले लग जाओ. आदमी को पास आकर अपनी परछाई पानी में नज़र आई. झील बोली परछाई पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत है. पानी इस बार ज़्यादा साफ़ है. इन्सान को अपनी परछाई से नज़रे मिलाने में लज्जा आ रही थी. लेकिन अहंकार इतना की बोल न सका “झील मैं अपने किये पे शर्मिंदा हूँ”.

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