रंगों का मेल, और भी रंगीन हो जाता है. ख़ामोश रहके भी, बहुत कुछ कहता है. कहने की भी अपनी कला है. ज़ुबान के बिना, बोलना, आसान नहीं होता. उसको समझना भी, आसान नहीं होता. अनकही बातों को, समझ लेना ही “कला की समझ” है. जो जितना समझ पाये, देख पाये, रंगो के समावेश को महसूस कर पाये. सांकेतिक भाषा आसान है, बस लगाव होना चाहिए. बोलने, और लिखने में भी, रुकना पड़ता है, बिंदु या साँस का सहारा लेकर. फिर बोलना होता है. श्वेता या पाठक बिंदुओं को जोड़ने की कोशिश करता है, की संवाद का सारांश क्या है.
रंगों की भाषा में, कोई बिंदु नहीं होता. बस समाना होता है. अपनी पहचान मिटा कर, एकसाथ खूबसूरती को सजोना होता है. बस एक होना होता है. एक सुर में होना होता है, मुस्कुराना होता है. जैसे बारिश के बाद rainbow का रंग, और ख़ूबसूरत बाग़ के रंग बिरंगे फूल. अलग अलग होकर भी “एक होना” एक “शक्ति” है, जो हमें महान बनाती है. “अनेकता में एकता” की सांस्कृतिक विरासत में, हमसब का अटूट विश्वास है, और यही “भारत माँ” को महान बनाता है.
कल रात, घर की सफाई में, लकड़ी का टुकड़ा मिला. मैंने पत्नी से पूछा, इसे garbage में डाल देता हूँ. सुबह उठा, तो किचन में यह painting देख कर, बस देखता ही रहा. कला के भी अनेक रूप हैं, हमसब के अंदर कोई न कोई कला है, बस अपने आप को ढूँढना होता है. मुझे समझ में नहीं आया, painting कहाँ से आई, santa तो नहीं दे गया. फिर सोंचा, कोरोना काल में, संता घर के अंदर कैसे आ सकता है. उसको भी social distancing का पता है. Painting इतनी खूबसूरत है, तो बनाने वाला, कितना खूबसूरत होगा.
सोंच ही रहा था, की पत्नी निचे आयी, और पेंटिंग देख के बोली “अच्छा सुख गई, अच्छी लग रही है”. मैंने पूछा, कहाँ से आई, तो बोली, कल रात मैंने लकड़ी के ऊपर, पेंट कर दिया. 18 सालों का साथ है हमारा, मैं खुश होऊँ, या गिलानी महसूस करूँ. इन्सान के पास जो होता है, उसको नहीं ढूंढता. जानने की कोशिश भी नहीं करता, की भगवान ने क्या कुछ दिया है. पत्नी का यह रूप देख कर मैं सन रह गया. कुछ बोला भी नहीं जा रहा था. मैंने बस बिना कहे उसकी उंगलिया चूम लीं.
कोरोना काल ने समय दिया है, साथ रहने, एक दूसरे को जानने का.रोने से अच्छा है, भगवान ने जो दिया है, उसको, ढूंढे और जानें. जीवन की दौड़ में, इंसान भागता ही रहता है. डर से और तेज़ भागता है, की कहीं रेस में पीछे न रह जाये. डर ऐसा की सुस्ताना भी भूल गया..कोरोना काल में “भागने के डर” को भी “डर” लग गया है. डर को डर का बहाना मिल गया है. इसलिए थोड़ा धीरे होजाईये, सुस्ता लीजिये. खुद को ढूंढिए, अपनोँ को ढूंढिए… मुझ जैसी गिलानी शायद किसी को न महसूस करनी हो…

